तू मुझे कबूल, मैं तुझे कबूल
आपसी वादों और समझौतों पर टिकी है निकाह की बुनियाद
??जोड़ियां स्वर्ग में बनती हैं, और जमीन पर उन्हें मिलती है मुकम्मल मंजिल। फिर चाहे फेरे लेकर, यस आई डू कहकर या हिजाब से कबूल हैं बुदबुदा कर। बेहद खूबसरत रस्म है निकाह, और इनमे चार चांद लगाती हैं रवायतें, यहां आशिता दाधीच बता रही हैं, निकाह के रस्मों - रिवाज के बारे में।
ईस्तीखरा - यह निकाह की सबसे पहली रस्म है। इसमें समुदाय के प्रमुख लोग खुदा से निकाह के लिए सहमति मांगते हैं। दूल्हे और दुल्हन के सुखी वैवाहिक जीवन के लिए दुआ मांगते हैं।
ईमाम जामीन - इस रस्म के लिए दूल्हे की मां दुल्हन के घर मिठाइयां, सोने या चांदी का सिक्का लेकर जाती है। ये सिक्का सिल्क के कपड़े में लपेट कर दुल्हन के परिवार को दे दिया जाता है।
मंगनी - मंगनी में दूल्हा और दुल्हन आपस में अंगूठियां बदलते हैं। दोनों परिवार आपस में उपहार, फल, सूखे मेवे, मिठाइयां देते लेते हैं।
हल्दी पीठी रस्म - यह रस्म कुछ कुछ हिंदू शादियों की हल्दी की रस्म की तरह ही होती है। इसमें दुल्हन को पीले रंग के कपड़े पहनाए जाते हैं। परिवार के लोग दुल्हन के चेहरे और शरीर पर हल्दी लगाते हैं। इस रस्म के बाद दुल्हन घर से तब तक बाहर नहीं निकल सकती, जब तक उसका निकाह ना हो जाए।
मेहंदी - इसमें दुल्हन के हाथ और पैरों पर मेहंदी लगाई जाती है।
शगुन का जोड़ा- यह रस्म भी हिन्दू रस्मों की ही तरह होती हैं। दूल्हे के परिवार से दुल्हन के लिए कपड़े और गहने भेजे जाते हैं, जिन्हे दुल्हन निकाह के दौरान पहनती है।
बारात के लिए रिसेप्शन- इस रस्म में जब दूल्हे की बारात दुल्हन के घर आती है, तब रिशेप्शन दिया जाता है।
निकाह- यह मुख्य फंक्शन है, जिसके बाद ही दूल्हे और दुल्हन को शौहर और बीबी माना जाता है।
क्या होती है निकाह की प्रक्रिया-
निकाह के दौरान दूल्हा और दुल्हन अलग-अलग बैठते हैं। इस समय वे दोनों एक-दूसरे को देख नहीं पाते। इस दौरान मेहर तय किया जाता है। मेहर वह रकम है, जो शादी के बाद दूल्हे द्वारा दुल्हन को दी जाती है। यह नकद दी जाए, जरूरी नहीं। दुल्हन तैयार हो तो दूल्हा इसे बाद में कभी भी देने का वादा कर सकता है। काजी निकाह की प्रक्रिया पूरी करवाता है। काजी, वकील और दो गवाहों की मौजूदगी में यह प्रक्रिया पूरी होती है। वकील बारी_बारी से दूल्हा और दुल्हन से इस शादी में उसकी रजामंदी पूछता है। दोनों से यह तीन_तीन बार पूछा जाता है। दोनों लोग परस्पर जब कहते हैं कि उन्हें यह निकाह कुबूल है, तो लोग दोनों को शादी की मुबारकबाद देते हैं और निकाह की सबसे खास रस्म पूरी होती है।
मुंह दिखाई- शादी के बाद जब दूल्हा और दुल्हन, एक-दूसरे को पहली बार देखते हैं तो उसे मुंह दिखाई कहा जाता है। इस रस्म को निभाने के लिए दूल्हा और दुल्हन के बीच में कांच (दर्पण) और कुरान को रखा जाता है। दर्पण द्वारा दूल्हा और दुल्हन एक-दूसरे के दीदार करते हैं।
रुखसत (बिदाई)- हिंदू शादियों की तरह ही ठाट -बाठ से लाड़ली बिटियां इस रस्म के साथ अपने बाबुल के घर से विदा होती हैं। जब दुल्हन अपने ससुराल पहुंचती है, तब सास, ननदों द्वारा उसका स्वागत होता है।
दावत-ए-वलीमा- जब दुल्हन, दूल्हे के घर पहुंचती है तो वहां जलसा मनाया जाता है, जिसमें दावत दी जाती है। इसे रिसेप्शन भी कहा जाता है।
पगफेरा - दुल्हन के परिवार की ओर से तब रिशेप्शन रखा जाता है, जब दुल्हन पहली बार ससुराल से अपने माता-पिता के घर आती है। इस दौरान दुल्हन को उपहार दिए जाते हैं।
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आपसी वादों और समझौतों पर टिकी है निकाह की बुनियाद
??जोड़ियां स्वर्ग में बनती हैं, और जमीन पर उन्हें मिलती है मुकम्मल मंजिल। फिर चाहे फेरे लेकर, यस आई डू कहकर या हिजाब से कबूल हैं बुदबुदा कर। बेहद खूबसरत रस्म है निकाह, और इनमे चार चांद लगाती हैं रवायतें, यहां आशिता दाधीच बता रही हैं, निकाह के रस्मों - रिवाज के बारे में।
ईस्तीखरा - यह निकाह की सबसे पहली रस्म है। इसमें समुदाय के प्रमुख लोग खुदा से निकाह के लिए सहमति मांगते हैं। दूल्हे और दुल्हन के सुखी वैवाहिक जीवन के लिए दुआ मांगते हैं।
ईमाम जामीन - इस रस्म के लिए दूल्हे की मां दुल्हन के घर मिठाइयां, सोने या चांदी का सिक्का लेकर जाती है। ये सिक्का सिल्क के कपड़े में लपेट कर दुल्हन के परिवार को दे दिया जाता है।
मंगनी - मंगनी में दूल्हा और दुल्हन आपस में अंगूठियां बदलते हैं। दोनों परिवार आपस में उपहार, फल, सूखे मेवे, मिठाइयां देते लेते हैं।
हल्दी पीठी रस्म - यह रस्म कुछ कुछ हिंदू शादियों की हल्दी की रस्म की तरह ही होती है। इसमें दुल्हन को पीले रंग के कपड़े पहनाए जाते हैं। परिवार के लोग दुल्हन के चेहरे और शरीर पर हल्दी लगाते हैं। इस रस्म के बाद दुल्हन घर से तब तक बाहर नहीं निकल सकती, जब तक उसका निकाह ना हो जाए।
मेहंदी - इसमें दुल्हन के हाथ और पैरों पर मेहंदी लगाई जाती है।
शगुन का जोड़ा- यह रस्म भी हिन्दू रस्मों की ही तरह होती हैं। दूल्हे के परिवार से दुल्हन के लिए कपड़े और गहने भेजे जाते हैं, जिन्हे दुल्हन निकाह के दौरान पहनती है।
बारात के लिए रिसेप्शन- इस रस्म में जब दूल्हे की बारात दुल्हन के घर आती है, तब रिशेप्शन दिया जाता है।
निकाह- यह मुख्य फंक्शन है, जिसके बाद ही दूल्हे और दुल्हन को शौहर और बीबी माना जाता है।
क्या होती है निकाह की प्रक्रिया-
निकाह के दौरान दूल्हा और दुल्हन अलग-अलग बैठते हैं। इस समय वे दोनों एक-दूसरे को देख नहीं पाते। इस दौरान मेहर तय किया जाता है। मेहर वह रकम है, जो शादी के बाद दूल्हे द्वारा दुल्हन को दी जाती है। यह नकद दी जाए, जरूरी नहीं। दुल्हन तैयार हो तो दूल्हा इसे बाद में कभी भी देने का वादा कर सकता है। काजी निकाह की प्रक्रिया पूरी करवाता है। काजी, वकील और दो गवाहों की मौजूदगी में यह प्रक्रिया पूरी होती है। वकील बारी_बारी से दूल्हा और दुल्हन से इस शादी में उसकी रजामंदी पूछता है। दोनों से यह तीन_तीन बार पूछा जाता है। दोनों लोग परस्पर जब कहते हैं कि उन्हें यह निकाह कुबूल है, तो लोग दोनों को शादी की मुबारकबाद देते हैं और निकाह की सबसे खास रस्म पूरी होती है।
मुंह दिखाई- शादी के बाद जब दूल्हा और दुल्हन, एक-दूसरे को पहली बार देखते हैं तो उसे मुंह दिखाई कहा जाता है। इस रस्म को निभाने के लिए दूल्हा और दुल्हन के बीच में कांच (दर्पण) और कुरान को रखा जाता है। दर्पण द्वारा दूल्हा और दुल्हन एक-दूसरे के दीदार करते हैं।
रुखसत (बिदाई)- हिंदू शादियों की तरह ही ठाट -बाठ से लाड़ली बिटियां इस रस्म के साथ अपने बाबुल के घर से विदा होती हैं। जब दुल्हन अपने ससुराल पहुंचती है, तब सास, ननदों द्वारा उसका स्वागत होता है।
दावत-ए-वलीमा- जब दुल्हन, दूल्हे के घर पहुंचती है तो वहां जलसा मनाया जाता है, जिसमें दावत दी जाती है। इसे रिसेप्शन भी कहा जाता है।
पगफेरा - दुल्हन के परिवार की ओर से तब रिशेप्शन रखा जाता है, जब दुल्हन पहली बार ससुराल से अपने माता-पिता के घर आती है। इस दौरान दुल्हन को उपहार दिए जाते हैं।
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