शादियां जिनमें है महिलाओं का बोलबाला
फिल्म ‘मेरे ब्रदर की दुल्हन’ का पोस्टर तो आपको याद ही होगा जिसमें अभिनेत्री कैटरीना बारात लेकर घोड़ी पर चढ़कर शादी के लिए निकलती है। यह कोरी फिल्मी कल्पना नहीं, हकीकत है देश के कई अंचलों की। आशिता दाधीच बता रही है, देश की उन शादियों के बारे में जहां महिलाएं होती हैं प्रधान। आइए, जानते है, जनजातियों की इन अजीबो-गरीब शादियों के बारे में।
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- दुल्हन की बारात - यूपी के अल्लीपुर टंडवा इलाकों में दुल्हन घोड़ी चढ़, बारात लेकर ससुराल जाती है। दूल्हे के दरवाजे पर द्वारपूजन होता है व आंगन में मंडप सजता है और शादी की सारी रस्में निभाई जाती हैं। शादी के दिन दुल्हन परिवार और नाते-रिश्तेदारों के साथ बारात लेकर ससुराल जाती है। दूल्हे के आंगन में ही खंभ पूजन कर मंडप सजाया जाता है। जनवासे से दुल्हन अपने परिवार के साथ मंडप में जाती है और फिर वहीं अग्नि को साक्षी मान दूल्हे के साथ सात फेरे लेती है। पैर पूजन, कन्या दान जैसी रस्मों के बाद वह सास-ननद के बीच रहती है और अगले दिन सुबह दूल्हे के घर पर ही कलेवा होता है। शाम को दुल्हन के ससुरालजन उसे मायके के लिए विदा करते हैं। अगले दिन दूल्हा अपने परिवार व रिश्तेदारों के साथ ससुराल जाता है। अगले दिन दुल्हन को ससुराल विदा करा ले जाते हैं।
उत्तराखंड के जौनसार बावर में भी शादी की रस्में निराली हैं। यहां वर के बजाए वधु घर से बारात लेकर जाती है अपने भावी पति के घर रहने के लिए। वधु के साथ आए बाराती स्थानीय वाद्य यंत्रों के साथ नाचते गाते हुए वर के गांव से कुछ दूर ठहर जाते हैं। वहां सत्कार के बाद शाम को दावत होती है। इसके बाद रात भर नाच-गाना चलता है, जिसे स्थानीय बोली में गायण कहते हैं। दूसरे दिन वर पक्ष के आंगन में हारुल, झेंता, रासो व जगाबाजी जैसे लोकगीत और नृत्यों का आयोजन होता है। बारात विदा करने के बाद दुल्हन तीन या पांच दिन ससुराल में रह कर वापस मायके आती है।
बंगाल और असम के ममनसिंह, ग्वालपाडा और कामरुप जिलों में रहने वाले गारो आदिवासीयों में वधु पक्ष उसी लड़के को चुनता है जिसने गले में खोपड़ियों की माला पहनी हो और जो बहुत ही भयानक दिखता हो।
दुल्हे की भरी जाती है मांग
छत्तीसगढ़ के ओरांव जनजाति की शादियों में दुल्हन भी दूल्हे की मांग भरती है। विवाह के लिए वर पक्ष बारात लेकर जाता है। मंडप में दुल्हा दुल्हन को हल्दी लगाने के बाद दुल्हा दुल्हन की मांग में सिन्दूर भरता है। इसके बाद कोल्हू से निकला सरसों का तेल दूल्हे की मांग पर लगाया जाता है। उसके बाद तीन बार उसकी मांग दुल्हन द्वारा भरी जाती है। पहली बार मांग भरने के बाद उसे पोंछ दिया जाता है और इसके बाद दूसरी बार मांग भरी जाती है। फिर वधू पक्ष दूल्हे को नौ रुपए देता है। यह सुखदान या कन्या के परिवार का दुल्हे को दिया गया आशीर्वाद कहलाता है।
अब भी होता है स्वयंवर
गुजरात में गोलग-घेडों के मुताबिक होली पर स्वयंवर होता है। जिसमे खंभे के ऊपर गुड़ और नारियल बांधते है जिसके इर्द-गिर्द सारी लडकियां नृत्य करती हैं। पुरुष भी उनके चारों ओर घेरा बनाकर नाचना शुरू करते है। महिलाएं अपने पीछे नाच रहे पुरुषों को पत्थर फेंक कर, झाड़ू मार कर दूर भगाती है। जो युवक इस महिला घेरे को तोड़कर खंभे में गुड और नारियल निकाल लाता है। उसे विजेता माना जाता है, यह विजेता अब इस घेरे की किसी भी महिला से विवाह कर सकता है।
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फिल्म ‘मेरे ब्रदर की दुल्हन’ का पोस्टर तो आपको याद ही होगा जिसमें अभिनेत्री कैटरीना बारात लेकर घोड़ी पर चढ़कर शादी के लिए निकलती है। यह कोरी फिल्मी कल्पना नहीं, हकीकत है देश के कई अंचलों की। आशिता दाधीच बता रही है, देश की उन शादियों के बारे में जहां महिलाएं होती हैं प्रधान। आइए, जानते है, जनजातियों की इन अजीबो-गरीब शादियों के बारे में।
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- दुल्हन की बारात - यूपी के अल्लीपुर टंडवा इलाकों में दुल्हन घोड़ी चढ़, बारात लेकर ससुराल जाती है। दूल्हे के दरवाजे पर द्वारपूजन होता है व आंगन में मंडप सजता है और शादी की सारी रस्में निभाई जाती हैं। शादी के दिन दुल्हन परिवार और नाते-रिश्तेदारों के साथ बारात लेकर ससुराल जाती है। दूल्हे के आंगन में ही खंभ पूजन कर मंडप सजाया जाता है। जनवासे से दुल्हन अपने परिवार के साथ मंडप में जाती है और फिर वहीं अग्नि को साक्षी मान दूल्हे के साथ सात फेरे लेती है। पैर पूजन, कन्या दान जैसी रस्मों के बाद वह सास-ननद के बीच रहती है और अगले दिन सुबह दूल्हे के घर पर ही कलेवा होता है। शाम को दुल्हन के ससुरालजन उसे मायके के लिए विदा करते हैं। अगले दिन दूल्हा अपने परिवार व रिश्तेदारों के साथ ससुराल जाता है। अगले दिन दुल्हन को ससुराल विदा करा ले जाते हैं।
उत्तराखंड के जौनसार बावर में भी शादी की रस्में निराली हैं। यहां वर के बजाए वधु घर से बारात लेकर जाती है अपने भावी पति के घर रहने के लिए। वधु के साथ आए बाराती स्थानीय वाद्य यंत्रों के साथ नाचते गाते हुए वर के गांव से कुछ दूर ठहर जाते हैं। वहां सत्कार के बाद शाम को दावत होती है। इसके बाद रात भर नाच-गाना चलता है, जिसे स्थानीय बोली में गायण कहते हैं। दूसरे दिन वर पक्ष के आंगन में हारुल, झेंता, रासो व जगाबाजी जैसे लोकगीत और नृत्यों का आयोजन होता है। बारात विदा करने के बाद दुल्हन तीन या पांच दिन ससुराल में रह कर वापस मायके आती है।
बंगाल और असम के ममनसिंह, ग्वालपाडा और कामरुप जिलों में रहने वाले गारो आदिवासीयों में वधु पक्ष उसी लड़के को चुनता है जिसने गले में खोपड़ियों की माला पहनी हो और जो बहुत ही भयानक दिखता हो।
दुल्हे की भरी जाती है मांग
छत्तीसगढ़ के ओरांव जनजाति की शादियों में दुल्हन भी दूल्हे की मांग भरती है। विवाह के लिए वर पक्ष बारात लेकर जाता है। मंडप में दुल्हा दुल्हन को हल्दी लगाने के बाद दुल्हा दुल्हन की मांग में सिन्दूर भरता है। इसके बाद कोल्हू से निकला सरसों का तेल दूल्हे की मांग पर लगाया जाता है। उसके बाद तीन बार उसकी मांग दुल्हन द्वारा भरी जाती है। पहली बार मांग भरने के बाद उसे पोंछ दिया जाता है और इसके बाद दूसरी बार मांग भरी जाती है। फिर वधू पक्ष दूल्हे को नौ रुपए देता है। यह सुखदान या कन्या के परिवार का दुल्हे को दिया गया आशीर्वाद कहलाता है।
अब भी होता है स्वयंवर
गुजरात में गोलग-घेडों के मुताबिक होली पर स्वयंवर होता है। जिसमे खंभे के ऊपर गुड़ और नारियल बांधते है जिसके इर्द-गिर्द सारी लडकियां नृत्य करती हैं। पुरुष भी उनके चारों ओर घेरा बनाकर नाचना शुरू करते है। महिलाएं अपने पीछे नाच रहे पुरुषों को पत्थर फेंक कर, झाड़ू मार कर दूर भगाती है। जो युवक इस महिला घेरे को तोड़कर खंभे में गुड और नारियल निकाल लाता है। उसे विजेता माना जाता है, यह विजेता अब इस घेरे की किसी भी महिला से विवाह कर सकता है।
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