Thursday, September 11, 2014

विचित्र शादियां Weirds weddings

विचित्र शादियां

शादियों के रंग अनोखे

प्रांतो और राज्यों के साथ रंग बदलती शादियां

रंगीन शादी, अनोखे रीती रिवाज

राज्य अलग, रिवाज अलग

भारतीय हिन्दू शादियां रस्मों रिवाजों और संस्कारों का दमकता हुआ प्रतिबिंब है। हर प्रांत के खान -पान, भाषा, संस्कृति, जीवन शैली में अंतर होता है, वहीं अंतर शादियों के रिवाजों में भी झलकता है। यहां आशिता दाधीच बता रही है, राज्यों और उनकी शादियों के अनोखे रीति -रिवाजों के बारे में-

बंगाली शादी -

बंगाली विवाह समारोह देखने में एक दम सादा लेकिन पर्याप्त रूप से रोचक होता है। दुल्हा बारात लेकर दुल्हन के घर पहुंचता है, तो उसका स्वगर फूलों से किया जाता है। दुल्हन के घर की सबसे ज्येष्ट महिला दुल्हे के ललाट पर आशीर्वाद स्वरुप 'बरन दला' लगाती है। दुल्हे पर गुलाब जल की वृष्टि की जाती है। दुल्हे और दुल्हन के शादी वाले दिन की पहली मुलाकात को 'शुभो दृष्टी' कहा जाता है। वर माला समारोह को 'माला बदल' कह कर संबोधित किया जाता है। जिसके बाद दुल्हन को उसके भाइयों उठाया जाता है। उठाने के लिए उसे 'पीड़ी' यानि एक छोटे से स्टूल पर बैठाया जाता है। भाई अपनी बहन को लेकर दुल्हे के इर्द - गिर्द सात फेरे लगाते है। जिसके बाद होती है सम्प्रदान और सप्तपदी की रस्म।

आसमिया शादी -

शादी से पहले दुल्हे और दुल्हन की मां निकटवर्ती नदी पर जाकर वहां से पानी का घड़ा भर कर लाती है। इस पानी से वर वधु को स्नान करवाया जाता है। आसमिया जोड़े की शादी का भोज उनकी शादी से पहले होता है। दुल्हे की बारात तो तब तक दुल्हन के घर में प्रवेश नहीं मिलता है जब तक वह काफी सारी धनराशि उपहार में नहीं देता। मंत्रोच्चार के मध्य दुल्हा अपनी भावी पत्नी के ललाट पर सिंदूर लगाता है। जिसके बाद आरती के साथ विवाह संपन्न होता है।

ओड़िया शादी -

इन शादियों में अन्य सभी रीति रिवाज तो भारतीय शादी जैसे ही होते है, लेकिन, जो बात ओड़िया शादी को सबसे अलग बनाती है वह है, शादी में दुल्हे की मां भाग नहीं लेती है। इन शादियों में सप्तपदी और फेरों को 'हाथा घंटी' कह कर संबोधित किया जाता है।

दक्षिण भारत -

पहले रस्म को 'काशी यात्रा' कहा जाता हैं। यह रस्म शादी के पहले होती हैं। दूल्हा पूजा करता हैं और फिर कहता हैं की शादी करने के बजाय वह काशी जाना चाहता हैं और अपना जीवन भगवान को समर्पित करना चाहता हैं। हाथ में छाता लेकर और लकड़ी के चप्पल पहनकर वह घर से निकलता हैं। दुल्हन के पिता और भाई दुल्हे को रोकने और मनाने की कोशिश करते हैं। दूसरा रस्म को 'स्नाताकुम' या 'धागे की रस्म' कहा जाता हैं। इस रस्म में दुल्हे की पूजा होती हैं।

कश्मीरी पंडित -

इन शादियों में सबसे जरूरी है दुल्हन के कान छिदाई की रस्म। साथ ही, इनमे सुहाग की निशानी 'देजहोर' पहनना बहुत जरूरी होता है, जो सोने की चैन और लटकन से बना होता है। इसे कान में ऊपर की तरफ पहना जाता है। शादी की अन्य रस्मों के नाम लिवून, वान्वुन, मान्ज़िरात, बरियाँ, थाल्स, पूलन का गहना, संज़रू, और देव्गों है.

पंजाबी शादी-

शादी से दो दिन पहले चुंग की रस्म होती है जिसमें दूल्हा और सात सुहागनें मिलकर चक्की पीसते हैं और फिर प्रसाद बांटा जाता है। इसके अगले दिन घडौली की रस्म होती है जिसमें लडकी और लडके की बुआ, मामी, मौसी अपने-अपने घर मटकों को सजाकर बैठते हैं और दूसरे पक्ष से बहन और जीजा इनसे मोलभाव कर मटके खरीदकर लाते हैं।

गुजराती शादी -

गुजराती शादी में फेरों के समय दूल्हा-दुल्हन को मौली की बनी एक ही माला पहनाई जाती है जो दोनों के जीवन को एक सूत्र में पिरोने का प्रतीक होता है। कन्यादान के समय सास द्वारा दूल्हे की नाक और विदाई के समय दूल्हा सास का पल्लू पकडता है।

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1 comment:

  1. very nice & content full information ,by this post we came to knew that there are varied culture is involved in marriages of various region. thanks.

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